गंगा चालीसा Ganga Chalisa Lyrics

गंगा चालीसा Ganga Chalisa Lyrics Lyrics

“Ganga Chalisa” Song Details:

Album/Label: Ganga Maa
Singer(s): Anuradha Paudwal
Lyricist(s): Traditional
Music Director(s): Nikhil Kamath, Vinay Tiwari
Genre(s): Chalisa
Music Label: © T-Series Bhakti Sagar

दोहा:

जय जय जय जग पावनी जयति देवसरि गंग
जय शिव जटा निवासिनी अनुपम तुंग तरंग

लिरिक्सबोगी.कॉम

चौपाई:

जय जय जननी हरण अघखानी
आनंद करनी गंग महारानी
जय भगीरथी सुरसरि माता
कलिमल मूल दलिनी विख्याता
जय जय जय हनु सुता अघ हननी
भीष्म की माता जग जननी
धवल कमल दल सम तनु साजे
लखी शत शरद चंद्र छवि लाजै

वाहन मकर विमल शुची सोहें
अमिया कलश कर लखी मन मोहें
जाड़त रत्न कंचन आभूषण
हिया मणि हार हरणी तम दूषण
जग पावनी त्रय ताप नसावनी
तरल तरंग तुंग मन भावनी
जो गणपति अति पूज्य प्रधाना
तिहूँ ते प्रथम गंग अस्नाना
ब्रम्हा कमंडल वासिनी देवी
श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि
साथी सहस्त्र सगर सुत तारयो
गंगा सागर तीरथ धारयो


अगम तरंग उठ्यो मन भावन
लखी तीरथ हरीद्वार सुहावन
तीरथ राज प्रयाग अक्षवट
धरयो मातु पुनि काशी करवट
धनी धनी सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी
तारनी अमित पित्र पद पीढ़ी
भागीरथ तप कियो अपारा
दियो ब्रह्मा तव सुरसरि धारा
जब जग जननी चल्यो हहराई
शम्भु जटा महं रह्यो समाई
वर्ष पर्यंत गंग महारानी
रहीं शम्भू के जटा भुलानी

पुनि भागीरथ शम्भुहीं ध्यायो
तब इक बूंद जटा से पायो
ताते मातु भई त्रय धारा
मृत्यु लोक नभ अरु पातारा
गईं पाताल प्रभावती नामा
मंदाकिनी गई गगन ललामा
मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनी
कलिमल हरनी अगम युग पावनि
धनि मइया तब महिमा भारी
धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी
मातु प्रभवति धनि मंदाकिनी
धनि सुर सरित सकल भयनासिनी

पान करत निर्मल गंगा जल
पावन मन इच्छित अनंत फल
पुरव जन्म पुण्य जब जागत
तबहीं ध्यान गंगा मह लागत
जई पगु सुरसरी हेतु उठावही
तई जगि अश्वमेघ फल पावहि
महा पतित जिन काहू ना तारे
तिन तारे इक नाम तिहारे
शत योजन हूँ से जो ध्यावहिं
निश्चय विष्णु लोक पद पावहीं
नाम भजत अगणित अघ नाशै
विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशे

जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना
धर्मं मूल गँगाजल पाना
तब गुन गुणन करत दुःख भाजत
गृह गृह सम्पति सुमति विराजत
गंगहि नेम सहित नित ध्यावत
दुर्जनहूँ सज्जन पद पावत
बुद्धिहीन विधा बल पावै
रोगी रोग मुक्तझ हवै जावै
गंगा गंगा जो नर कहहीं
भूखा नंगा कबँहु न रहहि
निकसत ही मुख गंगा माई
श्रवण दाबी यम चलहिं पराई

महा अघिन अधमन कहं तारे
भए नरका के बंद किवारें
जो नर जपे गंग शत नामा
सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा
सब सुख भोग परम पद पावहीं
आवागमन रहित भय जावहीं
धनि मइया सुरसरि सुख दैनि
धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी
ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा
सुन्दरदास गंगा कर दासा
जो यह पढ़े गंग चालीसा
मिले भक्ति अविरल वागीसा

दोहा:

नित नव सुख सम्पति लहैं
धरें गंगा का ध्यान
अंत समय सुर पुर बसे
सादर बैठी विमान
संवत भुज नभदिशि
राम जन्‍म दिन चैत्र
पुरण चालीसा कियो
हरि भक्तन हित नैत्र.

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