“Shiv Chalisa” Song Details:
| Album/Label: | Jai Girijapati Deendayala |
| Singer(s): | Ashwani Amarnath |
| Lyricist(s): | Traditional |
| Composer(s): | Ravi Bhan |
| Music Director(s): | Ravi Bhan |
| Genre(s): | Chalisa |
| Music Label: | © T-Series Bhakti Sagar |
ॐ नमः शिवाय..ॐ नमः शिवाय..
ॐ नमः शिवाय..
समस्त ब्रह्मांड को उत्पन्न करने करने वाले
उसे पालने वाले एवम संहार करने वाले
भगवान सदा शिव की महिमा तो
वेद पुराण भी नहीं सकते
केवल भगवान शंकर ही ऐसे देव है
जो मानव और दानव दोनों के ईस्ट देव है
भगवान शिव की स्तुति ओ में
श्री शिव चालीसा श्रेठ मानी गयी है और कल्याणकरी भी
श्री शिव चालीसा का पाठ करने व
सुनने से घर में सुख शांति धन वैभव भक्ति
और प्रेम की वृद्धि होती है
जैसे भगवान शिव
किसी एक जाती व धर्म के नहीं है
बल्कि पूरे मानव समाज के है
वैसे ही श्री शिव चालीसा और शिव स्तुति का अधिकार
पूरे मानव समाज को है
केवल बेल पत्र और जल धारा से
अति प्रसन्न होने वाले
भोले बाबा के चरणों में
समस्त शिव भक्तो की तरफ से
समर्पित है श्री शिव चालीसा
दोहा:
जय गणेश गिरिजा सुवन
मंगल मूल सुजान
क़हत अयोध्यादास तुम
देहु अभय वरदान
चौपाई:
जय गिरिजा पति दिन दयाला
सदा करत संतन प्रतिपला
भाल चंद्रमा सोहत नीके
कानन कुंडल नागफनी के
अंग गौर शिर गंग बहाये
मुण्डमाल तन छार लगाये
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे
छवि को देख नाग मुनि मोहे
मैना मातु की हवै दुलारी
बाम अंग सोहट छवि न्यारी
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी
करत सदा शत्रुन क्षयकारी
नंदी गणेश सोहे तहाँ कैसे
सागर मध्य कमल हैं जैसे
कार्तिक श्याम और गणराऊ
या छवि को कही जात न काऊ
देवन जब ही जाय पुकारा
तबही दुख प्रभु आप निवारा
किया उपद्रव तारक भारी
देवान सब मिली तुमही जुहारी
तुरत षडानन आप पठायऊ
लवनिमेष महँ मारी गिरायऊ
आप जलंधर असुर संहारा
सुयश तुम्हार विदित संसारा
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई
सबही कृपा कर लीन बचाई
किया तपहीं भागीरथ भारी
पूरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी
दानिन महं तुम सम काऊ नाही
सेवक स्तुति करत सदाहीं
वेद नाम महिमा तव गाई
अकथ अनादी भेद नहीं पाई
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला
जारे सुरासुर भये विहाला
कीन्ह दया तहँ करी सहाई
नीलकंठ तब नाम कहाई
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा
जीत के लंका विभीषण दीन्हा
सहस कमाल में हो रहे धारी
कीन्हा परीक्षा तबहीं पुरारी
एक कमल प्रभु राखेऊ जोई
कमल नयन पूजन चहाँ सोई
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर
भये प्रसन्न दिए इच्छित वर
जय जय जय अनंत अविनाशी
करत कृपा सब के घटवासी
दुष्ट सकल नित मोही सतावै
भ्रमत रहे मोही चैन ना आवे
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो
यही अवसर मोही आन उबारो
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो
संकट से मोही आन उबारो
मातु पिता भ्राता सब कोई
संकट में पूछत नहीं कोई
स्वामी एक है आस तुम्हारी
आय हरहु अब संकट भारी
धन निर्धन को देत सदाही
जो कोई जाँचे वो फल पाहीं
अस्तुति केही विधि करो तुम्हारी
क्षमहू नाथ अब चूक हमारी
शंकर हो संकट के नाशन
मंगल कारण विघ्न विनाशन
योगी यति मुनि ध्यान लगावें
नारद शारद शीश नवावें
नमो नमो जय नमो शिवाय
सुर ब्रह्मादिक पार न पाये
जो यह पाठ करे मन लाई
ता पर होत हैं शंभू सहाई
ऋनिया जो कोई हो अधिकारी
पाठ करे सो पावन हारी
पुत्र हींन कर इच्छा कोई
निश्चय शिव प्रसाद तेही होई
पण्डित त्रयोदशी को लावे
ध्यान पूर्वक होम करावे
त्रयोदशी व्रत करे हमेशा
तन नहीं ताके रहे कलेशा
धूप दीप नैवेध चढ़ावे
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे
जन्म जन्म के पाप नसावे
अंतवास शिव पुर मे पावे
कहेत अयोध्या आस तुम्हारी
जानी सकल दुख हरहु हमारी
दोहा:
नित्त नेम कर प्रातः ही
पाठ करो चालीस
तुम मेरी मनोकामना
पूर्ण करो जगदीश
मगसर छठी हेमंत ऋतु
संवत चौसठ जान
स्तुति चालीसा शिवही
पूर्ण कीन कल्याण.


